होली कभी ऐसा त्योहार हुआ करता था जिसमें सादगी, अपनापन और सच्ची खुशी बसती थी। लगभग बारह-पंद्रह वर्ष पहले तक लोग इस दिन अपने परिवार तथा मित्रों के साथ केवल गुलाल से होली खेलते थे। घरों में शुद्ध खोए से बनी गुझिया, मठरी और अन्य पकवान तैयार होते थे। माताएँ और दादियाँ बड़े प्रेम से पकवान बनातीं और बच्चे बेसब्री से उनके तैयार होने की प्रतीक्षा करते। मोहल्लों में लोग एक-दूसरे के घर जाकर “होली मुबारक” कहते, चरण स्पर्श करते और आशीर्वाद लेते थे। शाम के समय होली मिलने का अलग ही आनंद होता था। लोग बैठकर बातें करते, पुराने मनमुटाव दूर करते और रिश्तों में फिर से मिठास घोलते थे। वातावरण में स्नेह और मर्यादा दोनों साथ-साथ चलते थे।
पहले होली सच में परिवार का त्योहार होती थी। बच्चे अपने माता-पिता, चाचा-चाची, ताऊ-ताई और दादा-दादी के साथ मिलकर रंग खेलते थे। कोई भी किसी पर जबरदस्ती रंग नहीं डालता था। पहले बड़ों को हल्का सा गुलाल लगाकर आशीर्वाद लिया जाता था, फिर मित्रों के साथ हँसी-मजाक चलता था। दोपहर तक सब साथ बैठकर खाना खाते, घर की बनी गुझिया और नमकीन का स्वाद लेते और पूरा दिन अपनापन महसूस करते थे। उस समय होली में शोर कम और स्नेह अधिक होता था।
किन्तु आज कई स्थानों पर इस त्योहार का स्वरूप बदलता हुआ दिखाई देता है। कुछ युवकों ने इसे शराब और भांग के नशे तक सीमित कर दिया है। नशे की अवस्था में वे अनुशासन और सम्मान की सीमाएँ भूल जाते हैं। होली के नाम पर ऊँची आवाज में अशोभनीय गीत बजाना, राह चलते लोगों पर जबरन रंग डालना और विशेष रूप से युवतियों को रंग लगाने के बहाने अनुचित ढंग से छूना जैसी घटनाएँ सामने आती हैं। कई समाचारों में यह देखा गया है कि सार्वजनिक स्थानों पर लड़कियों से छेड़छाड़, जबरदस्ती रंग लगाने या पानी के गुब्बारे फेंकने के कारण विवाद और पुलिस कार्यवाही तक की नौबत आई। भीड़ का लाभ उठाकर गलत व्यवहार करना, किसी के मना करने पर भी “बुरा न मानो होली है” कहकर जबरदस्ती करना, यह सब अत्यंत निंदनीय है।

पहले होली का अर्थ था रिश्तों को निभाना और मन की दूरियों को मिटाना। यह केवल रंगों का खेल नहीं था, बल्कि उस कथा की याद भी था जिसमें भक्त प्रह्लाद की अटूट आस्था और हिरण्यकश्यप के अहंकार का अंत हुआ था। मान्यता है कि जब अत्याचारी हिरण्यकश्यप ने अपने ही पुत्र को भगवान की भक्ति से रोकने के लिए अनेक प्रयास किए और अंत में अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर अग्नि में जलाने की योजना बनाई, तब ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका दहन हो गई। उसी घटना की स्मृति में होलिका दहन किया जाता है, जो यह संदेश देता है कि अहंकार और अन्याय का अंत निश्चित है तथा सच्ची श्रद्धा और सत्य की विजय होती है।
किन्तु अब अनेक स्थानों पर सुबह से ही शराब की बोतलें खुल जाती हैं और समूह बनाकर सड़कों पर घूमना ही मानो उत्सव समझ लिया गया है। जिस पर्व का उद्देश्य बुराई पर अच्छाई की जीत को याद करना था, वही कहीं-कहीं बुरे आचरण का बहाना बनता जा रहा है। न संगीत में मधुरता रह गई है और न व्यवहार में संयम। त्योहार का केंद्र परिवार, परंपरा और श्रद्धा नहीं, बल्कि नशा और उच्छृंखलता बनता जा रहा है।
चिंता की बात यह है कि यह उच्छृंखलता केवल कुछ अविवाहित युवकों तक सीमित नहीं रही। कई बार विवाहित पुरुष भी इस दिन अपनी मर्यादा भूल जाते हैं। परिवार के साथ आने के बाद भी वे अन्य महिलाओं से अनावश्यक घनिष्ठता दिखाने का प्रयास करते हैं, रंग लगाने के बहाने सीमा लांघते हैं या भद्दे मजाक करते हैं। कुछ लोग शराब के नशे में अपशब्द बोलते हैं, किसी की तस्वीर या वीडियो बिना अनुमति बना लेते हैं और बाद में उसे साझा कर देते हैं। ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं जहाँ मोहल्लों में झगड़े हुए, परिवारों के बीच संबंध खराब हुए और कानूनी शिकायत तक करनी पड़ी।
सोशल मीडिया, विशेषकर Instagram पर बनने वाली रील्स ने भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। कई युवक होली के नाम पर भद्दे गानों पर नाचते हुए, लड़कियों पर जबरदस्ती रंग डालते हुए या नशे में हुड़दंग करते हुए वीडियो बनाते हैं ताकि उन्हें अधिक दृश्य और पसंद मिलें। कुछ लोग जानबूझकर ऐसी हरकतें कैमरे के सामने करते हैं जो वास्तविक जीवन में स्वीकार्य नहीं होतीं, केवल प्रसिद्धि पाने के लिए। इससे अन्य युवाओं में भी वैसा ही करने की होड़ लग जाती है।

केवल युवक ही नहीं, कुछ युवतियाँ भी सोशल मीडिया पर ध्यान आकर्षित करने के लिए मर्यादा से हटकर प्रस्तुति देती दिखाई देती हैं। भड़काऊ अंदाज में रंग खेलते हुए वीडियो बनाना, दोअर्थी संवादों पर अभिनय करना या जानबूझकर उत्तेजक दृश्य प्रस्तुत करना भी एक तरह का छिछोरापन ही है। जब त्योहार की पवित्रता से अधिक महत्व दिखावे और लाइक्स को मिलने लगे, तब उसका मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है।
कुछ स्थानों पर तो चिचोरापन इस हद तक बढ़ जाता है कि युवक बाइक पर समूह बनाकर निकलते हैं, राह चलती महिलाओं पर गुब्बारे फेंकते हैं या गंदे कमेंट करते हैं। कहीं-कहीं रंग में केमिकल मिलाकर लोगों की त्वचा खराब कर दी जाती है। कई बार लड़कियों को घर से निकलने में डर लगता है कि कोई जबरदस्ती रंग न लगा दे। यह सब उस पर्व की भावना के बिल्कुल विपरीत है, जो प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है।
आज अनेक स्थानों पर सुबह से ही शराब की बोतलें खुल जाती हैं और समूह बनाकर सड़कों पर घूमना ही मानो उत्सव समझ लिया गया है। तेज ध्वनि में अश्लील गीत बजाना, गाड़ियों पर चढ़कर हुड़दंग करना और राहगीरों को परेशान करना आम दृश्य बन गया है। न संगीत में मधुरता रह गई है और न व्यवहार में संयम। त्योहार का केंद्र परिवार और संबंध नहीं, बल्कि नशा और दिखावा बनता जा रहा है।
यह आवश्यक है कि हम फिर से विचार करें कि होली का वास्तविक अर्थ क्या है। यह पर्व किसी को असहज करने या अपमानित करने का अवसर नहीं, बल्कि रिश्तों को मधुर बनाने का माध्यम है। यदि हम मर्यादा, सहमति और परस्पर सम्मान को प्राथमिकता दें, तो वही पुरानी आत्मीय होली फिर से लौट सकती है, जिसमें आनंद था पर अशोभनीयता नहीं, उत्साह था पर उच्छृंखलता नहीं, और रंग थे पर किसी की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला व्यवहार नहीं।








